अलविदा! बीबीसी हिन्दी रेडियो सर्विस, लेकिन तेरी वो पत्रकारिता….✍

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राजनामा डॉट कॉम। (जयप्रकाश नवीन)। “जो चुप हुए तो पुकारेगी हर सदा हमको, न जाने कितनी जबानो से हम बयां होंगे……”’

बीबीसी हिन्दी सेवा के लिए उक्त पंक्तियाँ सटीक लेकिन अब अतीत बनने जा रही है। बीबीसी हिंदी रेडियो का शानदार 80 साल का इतिहास अब अतीत बन रहा है। बीबीसी के समाचारों पर करोड़ों लोगों का भरोसा रहा है।

पिछले कई सालों से बीबीसी हिन्दी रेडियो का प्रसारण बंद होने की अटकले अब सच साबित होने जा रही है। 31 जनवरी,2020 को बीबीसी हिन्दी रेडियो अपने शाम की सभा दिनभर का अंतिम प्रसारण करेगी।

जबकि 27 दिसम्बर  2019 को बीबीसी हिंदी का सुबह साढ़े छह बजे का कार्यक्रम ‘नमस्कार भारत’ का  अंतिम  बार प्रसारण बंद हो चुका है।

बीबीसी का कहना है कि वो शॉर्टवेव रेडिया प्रसारण बंद होने के बावजूद डिजिटल माध्यमों पर कुछ नियमित कार्यक्रम डिजिटल ऑडियो के रूप में प्रसारित करता रहेगा।

बीबीसी का कहना है कि डिजिटल सेवाओं के विस्तार के लिए यह कदम उठाया जा रहा है। बीबीसी के मुताबिक डिजिटल और टीवी के साथ ही एफएम पार्टनर  चैनल के ज़रिए वो अपने दर्शकों और श्रोताओं से जुड़े रहेंगे।

बीबीसी सोमवार से शुक्रवार को रात दस बजे एनडीटीवी पर ‘बीबीसी दुनिया’ कार्यक्रम का प्रसारण कर रही है। इससे पहले बीबीसी ईटीवी पर भी अपने आधे घंटे का कार्यक्रम लेकर आती थी।

यह पहली बार नहीं है जब बीबीसी ने हिंदी में शॉर्टवेव रेडियो प्रसारण समाप्त करने का फ़ैसला किया है। इससे पहले फरवरी 2011 में भी बीबीसी ने घोषणा की थी कि वो बीबीसी हिंदी रेडियो बंद करने पर विचार कर रहा है।

इससे पहले 12 दिसंबर 2016 को बीबीसी ने अपने रेडियो कार्यक्रमों को कम कर दिया था। बीबीसी हिंदी ने पहले सुबह आठ से साढ़े आठ तक प्रसारित होने वाला विश्व भारती और शाम को साढ़े नौ से दस बजे तक प्रसारित होने वाला कार्यक्रम घटनाचक्र बंद कर दिया था।

शॉर्टवेव प्रसारण बंद होने के बावजूद बीबीसी डिजिटल माध्यमों पर अपने कुछ नियमित कार्यक्रम डिजिटल ऑडियो के रूप में प्रसारित करता रहेगा। इनमें विवेचना और दुनिया-जहाँ जैसे कार्यक्रम शामिल हैं।

समय के साथ बदलती तकनीक और नई जनरेशन के हाथों में आए मोबाइल ने इस पुराने साथी को कहीं गायब कर दिया। समय के साथ इसके श्रोताओं में जबरदस्‍त गिरावट आई और अब ये एक करोड़ से भी कम रह गई है।

इसको ही देखते  हुए बीबीसी ने हिंदी में शॉर्टवेब रेडियो प्रसारण बंद करने का फैसला एक दशक पहले ही कर लिया था। इसको बंद करने की कवायद 1 अप्रैल 2011 को ही शुरू हो गई थी।

एक दशक के दौरान इससे जुड़े कई कार्यक्रमों का प्रसारण बंद किया गया। अब केवल नमस्‍कार भारत के नाम से प्रसारित होने वाला कार्यक्रम बचा है, जो 31 जनवरी को आखिरी बार प्रसारित किया जाएगा।

कभी बीबीसी हिन्दी रेडियो के 14 करोड़ से ज्यादा श्रोताओं की संख्या हुआ करती थी।बीबीसी का प्रसारण 41 भाषाओं में होता था। इसके अलावा दक्षिण एशिया और खाड़ी के देशों में भी बीबीसी के श्रोताओं की बड़ी संख्या रही है।

31जनवरी के  बाद बीबीसी हिंदी सेवा का नाम हमेशा के लिए इतिहास के पन्‍नों में दर्ज हो जाएगा। साथ ही इतिहास में दर्ज हो जाएंगे इससे जुड़े किस्‍से और कहानियां।

भारत के लोगों के लिए खासतौर पर शुरू की गई ये सर्विस कभी लोगों के दिलों पर राज करती थी। मोबाइल का जमाना नहीं था और लोग विविध भारती समेत बीबीसी हिंदी की आवाज सुनकर अपने दिन का आगाज करते थे।

बीबीसी हिंदी ने ही 1984 में सबसे पहले तत्‍कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्‍या कर देने की खबर का प्रसारण किया था। उस वक्‍त बीबीसी के करीब 3 करोड़ श्रोता हुआ करते थे।

बीबीसी हिंदी पत्रकारिता का एक महत्वपूर्ण स्तंभ रहा है। बीबीसी से करोड़ों लोगों का आत्मीयता का गहरा रिश्ता रहा है। शानदार समाचार प्रस्तुति,अपनी विश्वसनीयता और साहित्यिक सूझबूझ रखने वाले प्रसारको-पत्रकारों की टीम तथा शुद्ध एवं उच्चारण के चलते पिछले 80 सालों तक भारतीय श्रोताओं के दिलों पर बीबीसी ने राज किया।

बीबीसी के समकक्ष कई विदेशी रेडियो सेवाएँ और भी रही।जैसे वॉयस ऑफ अमेरिका, रेडियो मास्को, जर्मन रेडियो डॉयचे वेले, रेडियो चीन जैसे कई प्रसारण संस्थान थी, लेकिन जो साख बीबीसी हिन्दी ने हासिल की अन्य सेवाएँ उसे छू भी नहीं पाई।

बीबीसी लंदन से हिन्दी में प्रसारण पहली बार 11 मई 1940 को हुआ था। इसी दिन विंस्टन चर्चिल ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बने थे। बीबीसी हिन्दुस्तानी सर्विस के नाम से शुरु किए गए प्रसारण का उद्देश्य द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भारतीय उपमहाद्वीप के ब्रितानी सैनिकों तक समाचार पहुंचाना था।

भारत की आज़ादी और विभाजन के बाद हिन्दुस्तानी सर्विस का भी विभाजन हो गया, और 1949 में जनवरी महीने में इंडियन सेक्शन की शुरुआत हुई।

इस सेवा की शुरुआत भारत के जाने-माने प्रसारक ज़ुल्फ़िकार बुख़ारी ने की थी, बाद में बलराज साहनी और जॉर्ज ऑरवेल जैसे शानदार प्रसारक हिन्दुस्तानी सेवा से जुड़े।

पुरुषोत्तम लाल पाहवा, आले हसन, हरीशचंद्र खन्ना और रत्नाकर भारतीय जैसे शीर्ष प्रसारकों ने मोर्चा संभाला और हिन्दी सेवा ने झंडे गाड़ दिए।

1950 के दशक में बीबीसी हिन्दी सेवा में पूर्व पीएम  इंदर कुमार गुजराल ने भी पत्रकारिता और प्रसारण कौशल के क्षेत्र में अपने हाथ आज़माए, तब वे एक शर्मीले व्यापारी हुआ करते थे और 47 साल बाद भारत के प्रधानमंत्री बने।

1960 के दशक में आए महेंद्र कौल, हिमांशु कुमार भादुड़ी और ओंकारनाथ श्रीवास्तव, कैलाश बुधवार और भगवान प्रकाश 1970 के दशक में बीबीसी हिन्दी सेवा से जुड़े।मार्क टली और सतीश जैकब बीबीसी के स्तंभ माने जाते थे।

1980-1990 के दशकों में भी कई पत्रकार और प्रसारक आए जिनमें अचला शर्मा, कुर्बान अली,भारतेन्दु विमल, ललित मोहन जोशी, परवेज आलम, रेहान फजल, विजय राणा, राजेश जोशी,विपुल मुदगल, ममता गुप्ता, सलमा जैदी,सीमा चिश्ती, रूपा झा, रेणू आगाल, संजीव श्रीवास्तव, शिवकांत, आकाश सोनी, मानक गुप्ता, विश्वदीपक त्रिपाठी, मोहन जोशी, उर्मिला शेखावत, अनीष अहलूवालिया, अरूण अस्थाना, इन्दुशेखर, संतोष सिन्हा, आशुतोष चतुर्वेदी, इला त्रिपाठी, मधुकर उपाध्याय, एसपी,संजय पुगलिया जैसे कई नामी पत्रकारों और प्रसारक रहे हैं। 1994 में बीबीसी ने दिल्ली में हिन्दी सेवा  ब्यूरो बनाया।

बीबीसी पहला प्वाइंट ऑफ रेफरेंस बन गया और लोग खबरों की पुष्टि बीबीसी हिन्दी से करने लगें।घड़ियों की सूईयां तक मिलाई जाने की किंवदंती भी बीबीसी के बारे में प्रचलित रही है। चुनाव में नेताओं के कान इस बात पर लगे रहते थे कि बीबीसी क्या कह रहा है।

भारत -पाकिस्तान युद्ध, आपातकाल, प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की हत्या, बर्लिन वॉल विध्वंस, सोवियत यूनियन विघटन,  बाबरी मस्जिद विध्वंस, राजीवगांधी की हत्या, गोधरा ट्रेन कांड, 2003 में इराक पर अमरीकी सेना का हमला जैसे ये सभी घटनाएँ बीबीसी हिन्दी रेडियो के लिए मील का पत्थर साबित हुई।

1फरवरी, 2020 रेडियो भी होगा लेकिन उस रेडियो पर बीबीसी की आवाज खामोश मिलेगी। बीबीसी हिंदी रेडियो सेवा 80 साल बाद एक पूर्ण विराम के साथ ही एक बेहद अजीज आम लोगों से कोसो दूर चला जाएगा…..

“गुजर तो जाएगी तेरे बगैर भी दोस्त,

बड़ी उदास बड़ी बेकरार गुजरेगी”

अलविदा! बीबीसी हिन्दी रेडियो।

                                                                                 ……लेकिन तेरी वो पत्रकारिता।

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