अरविन्द की राजनीतिक भूल या अदूरदर्शिता

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राजनीति में छोटी से छोटी भूल किसी व्यक्ति को धूल चटाने के लिए पर्याप्त होता है। अरविन्द उनमे से एक हैं। उनकी जितनी अच्छी शुरुआत हुई -अगर थोडा भी राजनीतिक दूरदर्शिता होती तो आज आम जनता या मीडिया के लिए मखौल के पात्र नहीं बनते ?

arvind-kejriwal-govt (1)2011 से 2013 के बीच की कुछ राजनीतिक पार्टियां “अन्ना के आंदोलन” की पैदाइश मानी जा सकती है। आम आदमी पार्टी ,2012 के अंतिम चरण में लोगों के बीच आयी। तब तक कई पार्टियां जन्म ले चुकी थी। भारतीय राजनीतिक विकल्प पार्टी उनमे से एक है। भारतीय राजनीतिक विकल्प पार्टी,2012 के शुरुआत में ही ,चुनाव आयोग में अपनी उपस्थिति दर्ज़ करा चूका था।

शायद यह एक प्रवासी भारतीय द्वारा एकत्रित, सैंकड़ो युवाओं कि दूरदर्शिता का नतीज़ा था। युवाओं द्वारा पार्टी का नामाकरण ,”अन्ना” के विचार और देश की जरुरत के अनुसार, बहुत ही सटीक ढंग से किया गया था। लेकिन बिकाऊ मीडिया के कारण भारतीय राजनीतिक विकल्प पार्टी को लोगों के बीच,अपने को प्रचारित करने का अवसर नहीं मिला वर्ना पार्टी कि विचारधारा (vision),देश के बिगड़ते राजनीतिक माहौल में, देश को नई दिशा देने में सक्षम है।

अरविन्द द्वारा प्रस्तावित “गाव से प्लानिंग” सुनने में काफी अच्छा लगता है लेकिन जमीनी हक़ीक़त से काफी दूर दीखता है। इसका मुख्य कारण है शिक्षा। भारत के अशिक्षित गाव को पहले शिक्षा की आवश्यकता है। ऐसे हालात में भारतीय राजनीतिक विकल्प पार्टी द्वारा प्रस्तावित “राष्ट्रपति प्रणाली” सुगमता से मंज़िल प्राप्त करने वाला रास्ता प्रतीत होता है।

समूचे देश की जनता द्वारा चुना गया राष्ट्रपति ,दुनिया की नज़रों में एक नया उपयुक्त प्रयोग माना जा सकता है। इस पार्टी द्वारा प्रस्तावित (१) मज़दूरों को सरकारी पेंशन (२) जाति और धर्म के नाम पर कोई आरक्षण नहीं (३) गाव -गाव में लघु उद्योग (४) जनसँख्या पर नियंत्रण (५) बुजुर्गों को सहूलियतें इत्यादि मुद्दे ,बाकी सभी पार्टियों से हटकर है।

अरविन्द ने शुरुआत अच्छी की थी। लेकिन उसने त्यागपत्र देकर अपने राजनीतिक अदूरदर्शिता का प्रदर्शन किया है। 49 दिन में उसके द्वारा किये गए अच्छे कार्यों को एक-एक कर पलटा जा रहा है। कांग्रेस और बीजेपी द्वारा ,उसके द्वारा प्रस्तावित जनलोकपाल बिल को असेंबली में पेश नहीं होने देना, अरविन्द को एक अच्छा हथियार हाथ लग गया था।

इस हथियार को वह पार्लियामेंट के चुनाव में इस्तेमाल कर सकता था -बिना त्यागपत्र दिए ही। बाकि अपना कार्यकाल उसे दिल्ली के जन कल्याण में लगाना चाहिए था। लेकिन उसके महत्वाकांछी और आक्रामक विचार ने उसे गड्ढे में धकेल दिया। या ऐसा कहें कि उसने अपने पैर में खुद कुल्हाड़ी मार दी।

अन्ना हज़ारे का भी मानना है कि उसे त्यागपत्र नहीं देकर दिल्ली को चमकाना चाहिए था। और उसके किये गए अच्छे काम को लोग रोल मॉडल मानकर ,2019 में अच्छी जीत दिला सकते थे। अभी का हालात है कि न दिल्ली की जनता खुश हो पायी और नाही 2014 के चुनाव में कोई फायेदा मिलने वाला है। ऐसे जगहों पर लोग कहते हैं “…… का कुत्ता न घर का न घाट का”.

अगर 2014 के चुनाव के बाद भी अरविन्द ने अपने अपारदर्शी ,तानाशाही,अहंकारी और आक्रामक रुख में परिवर्तन नहीं किया तो देश की दूसरी आज़ादी की लड़ाई -एक मृगतृष्णा बनकर आने वाले 50 सालों तक टल सकता है। साथ ही अरविन्द ने देश के युवाओं को एक ऐसे चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है ,जहाँ वे किंकर्तव्यविमूढ़ की दशा में आ गए हैं।

…… ई योगेन्द्र प यादव 

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