अफसरों को हड़काने की जगह यूं आत्ममंथन करें सीएम

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एज ए मैन और ऐज ए पॉलिटीशियन नीतीश कुमार में कहीं दोष नहीं है ।दोष है तो ब्यूरोक्रेट्स से सांसद बने एक वैसे शख्स का, जिसके इशारे पर आईएएस और आईपीएस अफसरों का तबादला होता रहा है। जिनके इशारे पर नीतीश किसी कारणवश चलने को बाध्य हैं……..’

राजनामा.कॉम (विनायक विजेता)। पटना बिहार के प्रशासनिक अधिकारी हो या पुलिस अधिकारी। बीते छह वर्षों से बिहार और विभिन्न जिलों में पदस्थापित अधिकारियों की हालत मोबाईल फोन की तरह हो गई है।

कभी मोबाइल की तेज घंटी की तरह बजने वाले ऐसे अधिकारी आज ‘बेवरेशन मोड’ में जाने को बाध्य हो गए हैं। डर है की कहीं बढ़ते क्राईम की झल्लाहट में मुख्यमंत्री की गाज उन पर न आ गिरे।

अधिकारियों का ये ‘बेवरेशन मोड’ बुधवार को तब साफ परिलक्षित हो गया, जब सीएम ने राज्य के अधिकारियों से बिगड़ती विधि व्यवस्था पर वीडियो कान्सफ्रेन्सिंग के जरिए बात की।

इस ‘वीसी’ के क्रम में अधिकांश अधिकारी बेवरेशन यानी थरथराहट मोड में ही दिखाई पड़ रहे थे। अब भले ही कोई यह सफाई दे कि उनका यह मोड संभावित राजनीतिक भूकंप के कारण नहीं बल्कि दिन के 10:30 बजे आया वास्तविक भूकंप था।

खैर इनमें कई ऐसे भी अधिकारी थे जिनकी कार्यकुशलता के कारण एनडीए के साथ पहले मुख्य मंत्रीत्वकाल में नीतीश कुमार ने ‘लड़े सिपाही नाम हवलदार का’ के तर्ज पर विश्व भर में प्रसिद्धि बटोरी और विश्व प्रसिद्ध कई पत्र पत्रिकाओं में नायक के रुप में तो उभरे ही कई एवार्ड भी अपने नाम किया।

इसके पूर्व नीतीश के बिहार पुलिस का मोरल बुस्टप तब हुआ जब पटना जक्शन पर एक तत्कालीन बाहुबली सांसद ने पटना में पदस्थापित एक चर्चित आईपीएस अधिकरी को बेइज्ज्जत करने की कोशिश के क्रम में उनकी खाकी वर्दी और उसपर लगे बैच को फाड़ने और खींचने की कोशिश की।

तब उक्त अधिकारी द्वारा उक्त बाहुबलही के गाल पर लगाए गए एक ही तमाचे ने उन तत्कालीन सांसद की हेकड़ी गायब कर दी थी। तब उस पांच वर्षों में ही बिहार में सुशासन दिखाने वाले वैसे अधिकारी आज मेन-स्ट्रीम से गायब हैं।

यह दीगर बात है कि उनमें से कुछ अधिकारी अवकाश प्राप्त कर चुके हैं और अधिकांश अभी ‘कोल्ड स्टोरेज’ में हैं। उस प्रारंभिक पांच वर्षों में बिहार के आईएएस आईपीएस अधिकारियों ने कोई ऐसा मौका नहीं छोड़ा कि कभी मुख्यमंत्री को विधि-व्यवस्था के मसले पर किसी अधिकारियों को फटकार लगाने या वीसी करने की जरुरत पड़े।

कारण था उस वक्त बिहार में पदस्थापित आईएएस व आईपीएस अधिकारियों से लेकर राजधानी में पदस्थापित थानाध्यक्षों का तत्कालीन नेटवर्क व टीम वर्क। पर कालांतर में नीतीश कुमार की राजनैतिक लालसा व अदूरदर्शिता ने ऐसा माहौल कायम कर दिया कि अच्छे अधिकारी कोल्ड स्टोरेज में सड़ने को बाध्य हो गए और जो कुछ अच्छे अधिकारी राजधानी सहित जिलों में भी पदस्थापित हैं, वो राजनीतिक गाज के अनजाने भय से ग्रसित हैं।

अब न तो अधिकारियों के बीच पूर्ववर्ती  आपसी सामंजस्य वाला नेटवर्क है न ही टीम वर्क की भावना। नीतीश कुमार के पहले शासनकाल का वो वाक्या मुझे याद है, जब मैं पटना से प्रकाशित एक प्रमुख हिन्ही दैनिक का सीनियर रिपोर्टर हुआ करता था।

शायद यह वाक्या 2008-09 का होगा। तब पटना में जोनल आईजी से लेकर पटना के थानेदारों की एक ऐसी टीम थी जो ‘टीम वर्क’ के आधार पर काम करती थी। ऐसे में ही एक दिन शाम 7 बजे एक न्यूज चैनल ने एक्जीविशन रोड में एक युवती के साथ अभद्र और दुष्कर्म के प्रयास से संबंधित एक खबर बिना तथ्य जाने एक न्यूज चैनल पर ब्रेकिंग न्यूज बनाकर फ्लैश कर दिया।

फिर क्या था कुछ ही दिन पूर्व हमारे अखबार में संपादक के रुप में पदभार ग्रहण करने वाले हमारे तत्कालीन संपादक रेस हो गए। उन्होंने मुझे ही नहीं तत्कालीन समय में हमारे चीफ रिपोर्टर सहित अखबार के कई लोगों को घटना स्थल पर दौड़ा दिया।

वस्तु स्थिति भांपने के बाद मैं पुन: संपादक के पास आया और उन्हें बताया कि जिस युवती का मामला सामने आ रहा है वो एक पेशेवर युवती है और ग्राहक से पैसे के लेन-देन के बाद हुए विवाद में वह युवती अपने युवक ग्राहक का मोबाइल फोन चुराकर भाग रही थी जिस मोबाइल फोन को पाने के लिए उस युवक ने छीना झपटी की।

पर संपादक महोदय कहां मानने वाले थे। अपने अखबार और अपने रिपोर्टर की विश्वसनीयता को नजर अंदाज कर उन्होंने मुझसे कहा कि ‘अरे चूतिये लड़की के पैर के पास गिरा उसका अंदरुनी वस्त्र तुम्हें दिखाई नहीं पड़ रहा। तब मैंने उन्हें लाख समझाया कि सर यह उस युवती का अंदरुनी वस्त्र नहीं बल्कि छीना छपटी में गिरा उस युवती का रुमाल है पर वो कहां मानने वाले थे।

तब मैंने खीज में कह दिया कि जब टीवी फूटेज के आधार पर आप इसे अंग वस्त्र मान रहे हैं तो आप इसी फूटेज के आधार पर सूंघकर बताईए कि ये कपड़ा अंगवस्त्र है या रुमाल।’ बाद के दिनो में उस लड़की की सारी हकीकत भी सामने आ गई। इसके बाद वैसे सारे अखबार के संपादक बंगले झांकत नजर आए ज्निहोंने इस खबर को प्रथम पन्नों पर प्रमुखता के सथ छापा ही नहीं था, संपादकीय तक लिख डाली थी।

खैर संपादक सं इस मामले में तब हुई तानातानी के बाद और गलत खबर के साथ कभी समझौता नहीं करने की मेरी दृढ़ इच्छाशक्ति ने ही मुझे उस अखबार से विदा लेने को मुनासिब समझा और मैंने जून 2010 को इस अखबार से इस्तीफा दे दिया। 

खैर उस दिन शाम सात बजे इस घटी घटना पर तब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपनी कथित पारदर्शिता और तेजी दिखाते हुए दिखाते हुए बिना कोई जांच कराए 2 घंटे के अंदर पटना के जोनल आईजी, डीआईजी, एसएसपी सहित कई पुलिस अधिकारियों और थानाध्यक्षों के तबादले के आदेश जारी करवा दिए।

खुद को पाक-साफ दिखाने वाले मुख्यमंत्री ने सच्चाई जानने की कोशिश किए बिना वैसे अधिकारियों को स्थानांतरित कर दिया, जिनके कार्यो के कारण उन्होंने प्रसिद्धि पाई थी। इसके पूर्व भी अपने कार्यो और पुलिस विभाग के लिए कई सफल प्रयोग करने वाले कई अधिकारी सेंटिग पोस्ट में डाल दिए गए,जिनमे पटना के एक पूर्व एसएसपी भी शामिल थे।

एक्जीविशन रोड मामले के बाद पटना में तब पदस्थापित तत्तकालीन सारे पदाधिकारियों के सामूहिक स्थानांतरण के बाद से ही बिहार के पुलिस अधिकारियों का मनोबल ऐसा गिरा जो आज तक नहीं उठ सका। आज कुछ अधिकारियों के पास मनोबल है तो वह भी अंडर प्रेशर और बेवरेशन मोड में काम करने को बाध्य हैं।

एक अधिकारी ने हाल में एक ही जाति के दो आईपीएस अधिकारियों को जबरन सेवानिवृति मामले की चर्चा करते हुए कहा कि बड़बोले परंतु पूरे राज्य में ईमानदार माने जाने वाले अमिताभ कुमार दास व अजय कुमार वर्मा जैसे अधिकारियों का मामला आने वाले समय में नीतीश कुमार को सही राह और सही व्यक्ति की पहचान करा देगा।

इन अधिकारियों ने यह भी सवाल भी किया कि अब क्या कारण है कि नीतीश कुमार की चर्चा विदेश के पत्र-पत्रिकाओ में तो दूर देश की पत्र-पत्रिकाओ में भी नहीं हो रही।

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