अपने ही मुल्क में दफ्न होती ज़िंदगियां ! और कितनी शहादत ?

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-: अरविन्द प्रताप :-

झारखण्ड – छतीसगढ़ राज्य बनते ही इनके हिस्से में एक सबसे भयानक दुस्वारी आयी, जिसका नाम था नक्सलवाद, नक्सलवाद ने झारखण्ड और छतीसगढ़ जैसे कई राज्यों को खून के आंसू रुलाया है, जिसकी बलिवेदी पर न केवल सूबे के सांसद…और विधायक बलि चढ़ते रहे…बल्कि यहां की धरती रोजाना देश के जवानों के खून से लाल भी होती रही...

लेखकः अरविन्द प्रताप जाने-माने युवा टीवी पत्रकार हैं।

राज्य में बनी सरकारों ने कभी इस मसले पर गंभीरता नहीं दिखाई…नतीजन वक़्त के साथ यह समस्या भी सूबे में नासूर बनता गया…नक्सली कैसे सूबे में लाल कारीडोर का निर्माण करते चले गए…और सरकारें कैसे बौनी बनी रहीं… छतीसगढ़ में जवानों की मौत ने यह साबित किया है।

देश ने जितने सैनिक सीमा पर लड़ाई में नहीं गांवाये उससे ज्यादा हमने घरेलू मोर्चे पर उन्हें खोया है। आज झारखण्ड छतीसगढ़ जैसे कई राज्यों के इलाकों में नक्सलियों की समानांतर सरकार कायम है। देश में कभी एक नक्सलबाड़ी थी जहां से यह चिंगारी फूटी…

लेकिन अब झारखण्ड और छतीसगढ़ का हर ज़िला नक्सलबाड़ी में तब्दील हो चूका है…यहां का हर रास्ता नक्सलियों की सरपरस्ती से होकर ही गुजरता है…

आज आज़ादी के छह दशक बाद भी झारखण्ड का एक बहुत बड़ा हिस्सा हाशिए पर जीने को मज़बूर है…क्योंकि सूबे में बनने वाली सरकारों ने कभी भी उनके सरोकार की चिंता ही नहीं की…

दरअसल ग्रामीण इलाकों में बिखरी अकूत वन संपदा और धरती की कोख में छिपी समृद्धी और खनिजों के अथाह भंडार ने सूबे के आदिवासियों को कहीं का नहीं छोड़ा और कालान्तर में यहां कारपोरेट लूट की संकृति इतनी फली फूली की स्वत: नक्सलवाद की समस्या छतीसगढ़ और झारखंड में भड़कती चली गयी और आज हालात यह है…कि देश के लगभग 9 राज्यों के…200 से भी अधिक जिले नक्सल समस्या से बुरी तरह से ग्रसित हो गए है।

झारखण्ड और छतीसगढ़ में तो यह विकराल रूप धारण कर चूका है…सूबे का कोई ऐसा जिला नहीं है जहां नक्सलियों की तूती न बोलती हो…सूबे के आदिवासी इलाकों में तो स्थिति और भी भयावह है…इलाके के आदिवासी अपने जर-जंगल-ज़मीन से दूर होते जा रहे हैं…उन्हें उनकी ही धरती से बेदखल किया जा रहा है और नक्सली उन्हें सब्ज़बाग दिखाकर लाल झंडे की सरपरस्ती में आने को मज़बूर कर रहे हैं…

सवाल है कि आख़िर यह मसला क्यों सुरसा के मुख की तरह बढ़ता चला गया ? नक्सलियों के इरादे क्यों ख़तरनाक होते चले गए ? क्यों इनके गुट में युवाओं की टोली शामिल होती चली गयी ? क्यों ग्रामीण इलाकों में नक्सलियों की मर्ज़ी के बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता ? ये वे सारे सवाल हैं, जिनका जवाब सूबे में बनने वाली सरकारों ने कभी भी ईमानदारी से ढूंढने कि कोशिश नहीं की।

लेकिन एक बात तो साफ़ है कि जिस तरह से कपड़ों पे लगा खून खून से नहीं धोया जा सकता…वैसे ही बंदूकों से बंदूकें शांत नहीं हो सकती…अगर सूबे में खनिज आधारित उद्योगों कि प्रचुरता होती…हर हाथ को काम मिला होता…तो शायद नक्सलवाद के इस दावानल को भड़कने से रोका जा सकता था और जब लड़ाई घर के लोगों से ही हो तो यह मसला और भी गंभीर हो जाता है…

अगर इतिहास को खंगालें तो नक्सलियों ने झारखण्ड को खून के आंसू रुलाया है…जिसकी बलिवेदी पर न केवल सूबे के सांसद और विधायक बलि चढ़े बल्कि कई आलाधिकारी भी मारे गए। ये वही सूबे हैं, जहां के जवान बड़े अरमानों के साथ पुलिस में इसलिए भर्ती होतें रहे कि उन्हें रोजगार के साथ देश सेवा का भी मौका मिलेगा।

लेकिन आज हालात ये है कि जब भी कोई जवान अपनी ड्यूटी के लिए घर से निकलता है तो पुरे परिवार का जीना मुश्किल हो जाता है और उन्हें बस एक ही चिंता खाए जाती है कि वह वापस घर लौटेगा या नहीं और लौटता भी है तो एक बेजान ज़िस्म बनकर।

ऐसी हालत में कहीं मां की रोते-रोते आंखें पथरा जाती है…तो कहीं बेवा बन चुकी शहीद की पत्नी…दहाड़े मार अपनी चूड़ियां तोड़ रही होती है…कहीं पिता अपने दर्द से लड़ता अपने जवान बेटे के ज़नाज़े को कन्धा दे रहा होता है तो कहीं कोई नन्हा बच्चा धमाके में उड़ चुके पिता के जिस्म से उन अंगुलियों को ढूंढ रहा होता है…जिसे पकड़ कर कभी उसने चलना सिखा था…दरअसल इस टकराव का एक कारण और भी है…

देश का अधिकांश ग्रामीण इलाका विकास की किरणों से वंचित है…कदम-कदम पर गरीबी का स्याह अंधेरा पसरा है सत्ता और तंत्र की बेरुखी ने सहज ही ग्रामीण इलाकों को पुलिस और नक्सलियों का अखाड़ा बना दिया है…

अब सवाल है कि आखिर कौन समझाए इन पत्थरदिल हुक्मरानों को और बेदर्द संवेदनहीन नक्सलियों को कि अपनों को खोने का गम क्या होता है…वैसे भी जिस राज्य में नेता-नक्सली कनेक्शन आम हो…बंदी की एक घोषणा से पूरा प्रदेश ठहर जाता हो…रात होते ही समूचा ग्रामीण अंचल नक्सलियों के अभ्यारण्य में तब्दील हो जाता हो, वहां भला कैसी जनता और किसकी सरकार, अगर जल्द ही इस समस्या का…समाधान नहीं ढूंढा गया तो धरती ऐसे ही हमारे रणबांकुरों के खून से लाल होती ही रहेगी…

अब सवाल है…. और कितना वक्त चाहिए रमन सिंह और रघुवर दास जी बहुमत में होने के बाद भी नक्सलवाद के प्रति ये बेचारगी याद रखियेगा, जनता को कतई रास नहीं आनेवाली।

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