अनारकली बनीं स्वरा जगा रही उम्मीदें

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फिल्म देखने के बाद वरिष्ठ पत्रकार नवीन शर्मा का विश्लेषण…

वैसे तो अनारकली ऑफ आरा फिल्म इस वजह से देखने गया था कि यह एक परिचित पत्रकार के निर्देशन में बनी पहली फिल्म है। मैं जिन दिनों प्रभात खबर रांची में काम कर रहा था उन दिनों अविनाश दास देवघर में थे। उनसे सीधा साबका तो कभी पड़ा नहीं बस एक बार रांची आफिस जब वे आए थे तो औपचारिक मुलाकात हुई थी।

इस फिल्म का सब्जेक्ट थोड़ा बहुत तापसी पन्नू और अमिताभ बच्चन की फिल्म पिंक से मिलता-जुलता है। इन दोनों ही फिल्मों इस बात को सबसे ज्यादा फोकस किया गया कि औरत की मर्जी के खिलाफ उससे संबंध बनाने की कोशिश करना उचित नहीं है। खैर यह फिल्म अपनी कहानी तथा आरा का माहौल रचने में पूरी तरह कामयाब रही है। इस फिल्म की सबसे बड़ी खूबी स्वरा भास्कर का शानदार अभिनय है। स्वरा अनारकली के किरदार में इस कदर रम जाती हैं कि एकदम लगता है कि वो सचमुच कोई नाचने-गानेवाली ही हैं। वे अपने हाव-भाव, चाल-चलन और बोली के लहजे में बहुत स्वभाविक लगी हैं। उन्होंने गीतों में भी अच्छा डांस किया है । वैसा ही जैसा कि इस इलाके में होनेवाले कार्यक्रमों में होता है। फिल्म की कहानी हालांकि बहुत दमदार नहीं है, लेकिन स्वरा और संजय मिश्रा के सहछ अभिनय ने इस फिल्म को देखने योग्य बना दिया है।

स्वरा भास्कर पर मेरा पहली बार ध्यान रांझना फिल्म के दौरान गया था। उसमें उनका छोटा सा रोल था। इसके बाद तनु वेडस मनु रिर्टन में भी छोटे से रोल में दिखीं थीं। नील बटे सन्नाटा फिल्म में पहली बार वो लीड रोल में नजर आईं। इसमें उन्हें पहली बार अपनी प्रतिभा दिखाते हुए देखा था। अब अनारकली में यहीं प्रतिभा एक नए मुकाम पर चढ़ती नजर आ रही हैं। मुझे उनसे भविष्य में इससे भी शानदार अदायगी करने की उम्मीद बंधी है।

अविनाश ने पहली फिल्म में ही अपने लेखन और निर्देशन की छाप छोड़ी है। कहानी तो औसत है लेकिन निर्देशन में उन्होंने अच्छी पकड़ दिखाई है। फिल्म शुरू से लेकर आखिरी तक दर्शक को बांधे रखती हैं। लेकिन बुधवार को जब मैं कार्निवाल में ये फिल्म देख रहा था तो मुश्किल से आधा दर्जन लोग ही फिल्म देखने पहुंचे थे। खैर अनारकली के डायलाग बहुत चुटकिलें हैं। संवाद जिस परिवेश का तानाबाना बुना गया है उससे मैच करते हैं।जहां तक संगीत की बात है तो मुझे द्विअर्थी भोजपुरी गाने पसंद नहीं हैं फिर भी जिस परिवेश की कहानी है उसी के अनुरूप है।

नायिका अनारा का विरोध इस बात पर उबाल लेता है कि सरे महफिल वीसी बने संजय मिश्रा मंच पर ही नशे में धुत होकर दुष्कर्म करने की कोशिश करते हैं। मजेदार बात यह है कि इतने हंगामे और चाटा खाने के बाद भी उन्हें सुबह ये याद नहीं रहता कि रात को क्या वाकया हुआ। वो दूसरों से पूछते चलते हैं। इस फिल्म में ये साफ रेखांकित किया गया है कि पैसा,पावर, पद और पालिटिक्ल कनेक्शन के नशे में चूर होकर आदमी कहा तक गिर कर अपनी दुर्गति कर लेता है। अनारा जैसी मामूली हैसियत वाली महिला भी सीएम से डारेक्ट कनेक्शन रखने वाले और पुलिस को अपनी अंगुली पर नचाने वाले वीसी को मात देकर उसे अपनी औकात बता देती है।

खैर फिल्म देखने तो अविनाश की वजह से गया था पर स्वरा का मुरीद बन कर लौटा हूं।

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