अगली बार आओगी तो मुझे आत्मसात कर लेना !

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अलीशिया, कैटरीना, फैलिन… तूफानों के भी अजीबोगरीब नाम दिए हुए हैं। तूफानों के नाम प्रकृति विज्ञानियों की पत्नियों या प्रेमिकाओं के नाम पर हैं। सही भी कि जिन-जिन वैज्ञानियों के जीवन में जिनकी-जिनकी वजह से तूफान आया, उन्होंने तूफानों के नाम भी उन्हीं पत्नियों या प्रेमिकाओं के नाम के साथ समाहित कर दिए।

helanकहावतें बहुत चलती हैं। देश और समाज भले ही अलग-अलग हो लेकिन कहावतों में काफी समानता रहती है। कहते हैं कि विकास के पीछे किसी महिला का हाथ रहता है, तो यह भी कहावत चलती है कि विनाश के पीछे भी किसी न किसी महिला का ही हाथ होता है। अब देखिए न तबाही फैलाने वाले विनाशकारी तूफानों के पीछे भी तो किसी न किसी महिला के नाम का ही हाथ है।

ग्राहम बेल ने जब टेलीफोन का आविष्कार किया था तो उन्होंने अपनी प्रेमिका से कहा था कि यह आविष्कार तुम्हें ही ‘गिफ्ट’ करूंगा। …और यही हुआ। ग्राहम बेल का आविष्कार ग्राहम के नाम पर नहीं बल्कि हेलो के नाम से जाना गया। हेलो ग्राहम बेल की प्रेमिका थीं। अधिकांश लोग यह जानते भी नहीं लेकिन ग्राहम बेल के आविष्कार को हाथ लगाते ही हेलो बोलते हैं।

ग्राहम बेल ने ऐसा नायाब उपहार अपनी प्रेमिका को दिया कि पूरी दुनिया ही हेलो-हेलो में लगी हुई है। फोन के इस्तेमाल के बगैर आप रह नहीं सकते और फोन उठाएंगे तो आप हेलो से ही अपनी बात शुरू करेंगे। अब तो फोन क्या, हेलो तो ऐसे भी आम बोलचाल में चल पड़ी हैं। ग्राहम बेल ने हेलो को जीवंत कर दिया। जब तक यह दुनिया रहेगी, शायद तब तक हेलो जिंदा रहेंगी, उनका नाम चलता रहेगा।

हेलो में कोई यह नहीं देखता कि गांव है या शहर, आधुनिक है या गंवार, कुलीन या मलिन, देसी है या विदेशी… सब हेलो-हेलो बोलते हैं और गप्पे हांकते हैं। तो फैलिन ने भी खूब नाम कमाया। सुनाम हो या कुनाम, नाम तो गुंजाया ही। फैलिन ने खूब खौफ फैलाया। फैलिन तबाही की टीआरपी लेकर आई, उसने टीवी वालों की खूब दुकान चलवाई और चली गई।

एक टीवी पत्रकार मित्र ने कहा कि फैलिन तो टीवी वालों की ही प्रेमिका साबित हुई। कुछ भी हो कमाई होनी चाहिए। कोई मरे तो कमाई। कोई बच जाए तो कमाई। बड़ा मजा आ रहा था, जब एक बड़े प्रख्यात टीवी चैनल की बड़ी सौंदर्यशालिनी रिपोर्टर ओड़ीशा के फैलिन से प्रभावित होने वाले गांव-घर छोड़कर शिविर में आए लोगों से सवाल कर रही थीं।

उनका विद्वत सवाल मीडिया के विद्वत भविष्य का तूफानी संदेश भी साथ-साथ ही देता जा रहा था। तूफान के डर से प्रशासन जिन लोगों को खदेड़ कर शिविर में लाया और तूफान को लेकर तमाम किस्म की आशंकाएं फैली हों, ऐसे माहौल में रिपोर्टर मोहतरमा टीवी के दर्शकों से मुखातिब होकर कहती हैं, ‘अभी हम उन लोगों के बीच में हैं जो तूफान प्रभावित इलाकों से सुरिक्षत स्थान पर लाए गए हैं।

हम उन्हीं से बात करते हैं…’ अब वे रिपोर्टर ओड़ीशा के गांव-देहात से आए लोगों में से किसी एक से पूछती हैं, ‘आप यहां क्यों आए हैं?’ …अब रिपोर्टर महोदया के इस विद्वत प्रश्न पर वह गंवई तो खुद को फंसा हुआ महसूस करने लगता है कि वो क्या कहे। वह कभी रिपोर्टर का मुंह देखता है और कभी टीवी कैमरे की तरफ देखने लगता है। उसके चेहरे की उलझन साफ-साफ बताती है कि तूफान आने की सूचना सही भी है कि गलत है! वह अपना गांव छोड़ कर यहां भला क्यों आ गया है! फिर अचानक से वह सम्भलता है और कहता है, ‘तूफान आने वाला था, इसीलिए हमें बचाने के लिए यहां ले आया गया है। रिपोर्टर मोहतरमा अंग्रेजी मौलिकता से भरी हुई हैं और हिंदी में सवाल पूछना भारी पड़ रहा है, लिहाजा वे अपना दिमाग इस्तेमाल किए बगैर फिर हलकान-परेशान एक महिला से पूछती हैं, ‘आप अपना घर-बार छोड़ कर क्यों आई हैं?’ …महिला मुंह बनाती हैं और रिपोर्टर से ही पूछती हैं, ‘क्या आपको पता नहीं है कि हम लोगों को यहां क्यों लाया गया है?’ अब टीवी पर दृश्य कुछ ऐसा हो जाता है कि गांव की वह महिला रिपोर्टर लगने लगती है और रिपोर्टर बड़े कातर भाव से उसका जवाब देने लगती हैं। तो यह फैलिन का ही प्रभाव था जिसने बड़े-बड़ों का कुछ देर के लिए रोल बदल दिया।

बड़ी-बड़ी सुरक्षा में रहने वाले लोग तक ऐसे भाग रहे थे कि जैसे वे इस धरती पर स्थाई रहने वाले हैं। तूफान ने भी यह संदेश दिया कि जब संहार करना होता है तो वह ऐसे आता है कि बचने का मौका नहीं देता। सुनामी की तरह आता है, कैटरीना की तरह आता है और हजारों-लाखों जिंदगियां अपने प्रवाह में समाहित कर ले जाता है।

इस बार तो फैलिन केवल खेलने आई थी। मृत्यु का खौफ किस तरह लोगों के चेहरे पर नाचता है, देखने आई थी। प्रकृति से मानव जगत के प्रेम का तापमान लेने आई थी फैलिन। वह संदेश देकर गई है कि अगली बार आऊंगी तो हेलेन बन कर आऊंगी, मुझे आत्मसात कर लेना..

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