अगर साईज पता हो तो पाठकों को अंडरगार्मेंटस भी बांट दे अखबार

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अखबारों के पास अब केवल  अंडरगार्मेंटस बांटना ही रह गया है।अगर अंडरगारमेंटस बांटना भी चाहेंगे तो बेचारे बांट नहीं पाएँगे क्यों कि उन्हें पाठकों के साइज और नंबर पता नहीं है…..”

एक्सपर्ट मीडिया न्यूज नेटवर्क (जयप्रकाश नवीन)। एक समय अखबार का मतलब संजीदा खबरें, जो जनसरोकार से जुड़ी होती थी। लोग अखबार बड़े चाव से खरीदकर पढ़ा करते थे। अखबारों की पहचान खबर और उसमें प्रकाशित होने वाली सामग्री से हुआ करती थी। नब्बे के आखिरी दशक तक अखबारों के बीच खबरों को लेकर प्रतिस्पर्धा थी।

लेकिन अब लगभग सभी अखबारों से जनहित के समाचार, जनता की समस्याएँ  गायब  होती चली गई। अखबारों की गिरती साख ने अखबारों तथा पत्रकारों को किस हद तक पहुंचा दिया है। 

इसकी बानगी है अखबारों में पाठकों के लिए चलाई जा रही लाखों की स्कीम।  अखबार लगातार जनता का विश्वास खोते जा रहे हैं। लोगों की दिलचस्पी बनाए रखने के लिए  ही अखबारों में लाखों-करोड़ों की योजनाएं चलाकर अखबार बेचने की होड़ मची हुई है।

मतलब आप अखबार पढ़िए और घर -मकान, कार, फ्रीज, बाइक जीतने के सपने देखिए। राजधानी पटना से प्रकाशित कुछ अखबारों पाठकों को लुभाने एवं प्रसार संख्या बढ़ाने के लिए इन दिनों नयी-नयी स्कीम परोसी जा रही है।

कुछ तो साल भर के लिए कूपन योजना भी चला रहे हैं। साथ में गिफ्ट और जन्म दिन के फ्री विज्ञापन भी दे रहे हैं। पाठकों के लिए इनामों की बौछार दिख रही है।

दरअसल यह मीडिया तथा अखबारों के गिरावट का दौर है। कारपोरेट का दबाव अखबारों तथा इलेंक्ट्रानिक मीडिया पर साफ दिख रहा है। जनहित के मुद्दे जब मीडिया से गायब होंगे तो लोगों की दिलचस्पी बढ़ाने के लिए इसी तरह की योजनाओं को बाजार में झोंकना पड़ेगा।

दरअसल अखबार एक प्रोडक्ट हो गया है तथा पाठक महज एक ग्राहक बनकर रह गया है। जिसे अखबार के मालिका अपना प्रोडक्ट बेच रहे हैं। इस बेरहम बाजार में पाठक को कंटेंट से आकर्षित  करने अथवा जोड़े रखने की बजाय लाखों करोड़ों की योजनाओं से लुभाया जा रहा है।

इन आकर्षक योजनाओं के बीच पाठक की हालत यह है कि वह कंटेंट की तुलना करने की बजाय  अखबारों की स्कीमों की आपस में तुलना करते हुए बड़े ईनाम का इंतजार कर रहा है।

फर्जी पुरस्कार वितरण…

बिहार के कई  जिलों  में अखबारों के चल रहे संस्करणों में भी इनामों की बौछार का मुकाबला चल रहा है। खबर के साथ -साथ  पाठकों के घरों में भी तमाम तरह के उपहार पहुंच रहा है। अखबार  अपनी अपनी प्रसार संख्या बढाने के लिये हर संभव उपाय कर रहे हैं।

पाठकों को अपनी ओर खींचने और उन्हें लुभाने के लिए शायद ही कोई ऐसा अखबार होगा जो अपने पाठकों को उपहार न बांट रहा हो। अब पाठक  किसी भी अखबार को लेने के पहले सबसे पहला सवाल यही करता है कि ‘‘गिफ्ट’’ क्या है और अखबार कितने पेजों का है। यानी उसे भी अब सामग्री से कोई सरोकार नहीं है  उसकी निगाह में पृष्ठ संख्या और गिफ्ट ज्यादा महत्वपूर्ण हो गए हैं। 

बिहार के पटना से प्रकाशित बड़े अखबारों की की  हालत यह है कि अखबार अब तक अपने पाठकों को ‘चाय पत्ती,‘साबुन, शेम्पू   लोटा-थाली ,गिलास, टब -मग बाल्टी,चादर तौलिया बैग, डिनरसेट ,बर्तन तक बांट रहे हैं । 

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