अखबारों-टीवी चैनलों के लिए टर्निंग पॉइंट है बिहार चुनाव

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‘हिंदी के बड़े तुरर्म खां अखबारों के लिए राजनैतिक मोर्चे पर स्थाई तौर पर सूखा बन गया है। मीडिया के मालिकों को भाजपा से कमाई की उम्मीद नहीं रखनी चाहिए। और जब सत्तारूढ़ पार्टी सूखा रखेगी तो विरोधी पार्टियों से तो वैसे ही कुछ नहीं मिलना है।’ विस्तार से पढ़िए हिंदी दैनिक अखबार नया इंडिया के वरिष्ठ पत्रकार व संपादक हरिशंकर व्यास का विश्लेषण…...

hari-shankarनरेंद्र मोदी और अमित शाह न केवल भारत की राजनीति, चुनाव लड़ने के तौर-तरीकों को बदल दे रहे हैं बल्कि मीडिया को आटे-दाल का भाव मालूम करा दे रहे हैं। बिहार का चुनाव हिंदी-अंग्रेजी अखबारों, टीवी चैनलों के लिए टर्निंग पॉइंट है।

संदेह नहीं कि चुनाव वह मौका होता है जब मीडिया घराने, अखबार, चैनल राजनैतिक पार्टियों और उम्मीदवारों से दो नंबर की कमाई करते हैं। एक हिसाब से यह इनके अस्तित्व के लिए जरूरी भी हो गया है।

मंदी और लागत के आज के संकट में चुनाव के वक्त राजनैतिक विज्ञापन से बड़े अखबारों का, लालाओं का खजाना बनता है तो मझोले और छोटों के लिए साल-दो साल का राशन पानी जुटता है।

तभी बिहार में ठीक चुनाव से पहले कई टीवी चैनल पहुंच गए। मालिकों ने सोचा पार्टियां विज्ञापन देंगी। लेकिन नई चैनलों की बात तो दूर प्रदेश के पुराने चैनल और स्थापित बड़े अखबारों को भी लाला पड़ा हुआ है।

भाजपा ने दो टूक अंदाज में फैसला किया है कि न दो नंबर में पैसा दिया जाएगा और न रेटकार्ड में पोलिटिकल प्रचार की एक्स्ट्रा विज्ञापन रेट अनुसार अखबारों को कमाई करने दी जाएगी। भाजपा का स्टैंड है कि यदि हम नेताओं का कहा अखबार नहीं छापते हैं और उसके लिए भी पैसा चाहते हैं तो हमें यह मंजूर नहीं। इसलिए जो करोड़ों करोड़ का पैकेज बनता था वह बिहार चुनाव में खत्म हो गया है।

ऐसा ही नीतीश कुमार-लालू यादव–कांग्रेस के महागठबंधन ने भी किया है। जो नंबर एक चैनल है उसको भी डीएवीपी-रेटकार्ड अनुसार विज्ञापन गया है तो हिन्दुस्तान, प्रभात खबर, जागरण, भास्कर भी इसी नीति में विज्ञापन पा रहे हैं। नीतीश कुमार के महागठबंधन ने तो और भी गजब किया है। यह विज्ञापन नहीं के बराबर रिलीज कर रहा है।

इसका अर्थ यह नहीं कि मीडिया मैनेज नहीं है। सब मालिक लाइन लगा कर खड़े हैं। हवा बना-बिगाड़ रहे हैं। और तो और मालिक लेने के बजाय चंदा देने की नीति अपना जान छुड़ाने में भला समझ रहे हैं। सचमुच बिहार के इस चुनाव को मीडिया के मालिक लाला लोग शायद ही भुला पाएं।

अखबार में एकतरफा खबरें मिलेंगी लेकिन उनकी पत्रकार टीम दिल्ली से आए पत्रकारों के बीच उलटी हवा बनाते मिलेंगे। अपने को तो यह भी सूचना है कि एनडीए और महागठबंधन दोनों तरफ यह मैसेज आया गया कि मीडिया मालिकों को पैसा देने की कोई जरूरत नहीं है। इन पर पैसा जाया करना फालतू है।

फिर महागठबंधन तो इसलिए भी नाराज है कि नीतीश कुमार के राज में अखबारों ने सरकार से विज्ञापन अरबों के लिए और अब नीतीश कुमार के यहां यह कहला दिया गया है कि फला पैकेज लेंगे तो खबर छपेगी।

जो हो, पते की बात है कि हिंदी के बड़े तुरर्म खां अखबारों के लिए राजनैतिक मोर्चे पर स्थाई तौर पर सूखा बन गया है। मीडिया के मालिकों को भाजपा से कमाई की उम्मीद नहीं रखनी चाहिए। और जब सत्तारूढ़ पार्टी सूखा रखेगी तो विरोधी पार्टियों से तो वैसे ही कुछ नहीं मिलना है।

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