अंततः कैंसर की आगोश में समा गये बिहार के वरिष्ठ पत्रकार अरुण कुमार

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बिहार के वरिष्ठ पत्रकार अरुण कुमार का निधन दीपावली के दूसरे दिन यानी गुरुवार को हो गया। कैंसर की बीमारी से संघर्ष के दौरान भी वे निरंतर सक्रिय रहे। इनके निधन को जनपक्षीय पत्रकारिता के लिए अपूरणीय क्षति माना जा रहा है।

journalist_arun kumarप्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (पीसीआइ) के सदस्य रह चुके अरुण कुमार कैंसर से पीड़ित थे। बेगूसराय जिले के मधुरापुर स्थित आवास पर उन्होंने अंतिम सांस ली।

अंग्रेजी, हिंदी और इतिहास विषयों मे एमए अरुण कुमार ने रांची से प्रकाशित अंग्रेजी साप्ताहिक न्यू रिपिब्लक से अपनी पत्रकारिता के सफर शुरु किया था। वे बिहार श्रमजीवी पत्रकार यूनियन के महासचिव थे।

इंडियन जर्निलस्ट्स यूनियन (आइजेयू) की राष्ट्रीय कार्यकारिणी समिति के सदस्य और द टाइम्स ऑफ इंडिया न्यूजपेपर इम्पलाइज यूनियन, पटना के अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी उन्होंने निभाई।

उन्हें ग्यारहवीं प्रेस कौंसिल ऑफ इंडिया का सदस्य बनाया गया। वे बिहार के तीसरे पत्रकार थे जिन्हें प्रेस कौंसिल ऑफ इंडिया का सदस्य चुना गया था।

बिहार में पत्रकारों के हक-हकूक के पक्ष में अरुण कुमार सबसे सशक्त आवाजों में से एक थे। ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ के कर्मचारियों का कई वर्षों तक चलने वाला लंबा संघर्ष अरूण कुमार के नेतृत्व के बगैर संभव न था। जब भी पत्रकारों पर हमले होते उसके विरूद्ध हमेशा अरूण कुमार सबसे अग्रिम पंक्ति में खड़े होते।

‘प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया’ के तत्कालीन चेयरमैन मार्केंडय काट्जू ने बिहार में पत्रकारिता में लगाए जा रहे अंकुश के सबंध में जिस तीन सदस्यीय समिति का निर्माण किया अरुण कुमार उस टीम से सबसे प्रमुख सदस्य थे। प्रेस काउंसिल की रिपार्ट तैसार करने में अरूण कुमार की महती भूमिका थी।

उन्होंने इस रिपोर्ट केा तैयार करने के सिलसिले में पत्रकारों के अलावा विभिन्न जनसंगठनों द्वारा प्रस्तुत ज्ञापनों को भी स्वीकार किया था। उस रिपोर्ट के बाद आलोचनात्मक रूख रखनक वाले जनतांत्रिक स्वरों को थोड़ा स्पेस भी मिलने लगा।

रिटयरमेंट के बद अरुण कुमार बेगूसराय लौटे और वहॉं के कई मसलों को भी उठाते रहे। वे अॅंग्रेजी के उन पत्रकारों में थे जो हिंदी में पर्चे लिखा करते थे।

‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ पटना में वे अमूमन वामपंथी पार्टियों का बीट देखा करते तथा यथासंभव कोशिश करके वामदलों को अधिकतम स्पेस दिलाने का प्रयास करते। अॅंग्रेजी अखबारों में वे वाम विचारधारा का समर्थन करने वाले चुनिंदा पत्रकारों में शामिल थे। वे सी.पी.आई के बाकायदा सदस्य भी थे।

वैश्वीकरण के बाद के दौर में उनका हमेशा ये प्रयास रहता कि नये दौर में पत्रकारिता के बदलते स्वरूप एवं उस पर पूँजी के दबावों को उसके आर्थिक-राजनैतिक परिप्रेक्ष्य में समझा जाए। पत्रकारिता पर हमेशा उन्होंने बातचीत व विमर्श का आयोजन किया तथा एक समझ बनाने की कोशिश किया करते।

विभिन्न जनांदोलनों से भी गहरा रिश्ता था तथा जनता के लिए होने वाले संघर्षों के उतार-चढ़ाव पर वे पैनी निगाह रखा करते। जबसे उन्हें अपनी कैंसर की बीमारी का पता चला, वे बेहद बहादुरी से उससे मुकाबला करते रहे।

अपने फेसबुक पेज के माध्यम से होने वाली घटनाओं पर निगाह रखते तथा कभी-कभी बेहद आवश्यक टिप्पणी भी किया करते। शेष दुनिया से संवाद का माध्यम अपने अंतिम वक्त उनका फेसबुक ही रह गया था।

मीडिया घरानों के हमलों के विरूद्ध पत्रकारों, कर्मचारियों के पक्ष में बोलने वाला दुर्लभ व ताकतवर आवाज हमारे बीच से हमेशा के लिए चली गयी।

जन संस्कृति मंच के राज्य सचिव सुधीर सुमन ने कहा है कि मंच उनकी पत्नी, दोनों पुत्रों, एक पुत्री और उन्हें चाहने वाले तमाम पत्रकार, लेखक-बुद्धिजीवियों और वामपंथी कार्यकर्ताओं के प्रति जन संस्कृति मंच अपनी संवेदना व्यक्त करता है। कुमार वामपंथी आंदोलनों और मानवाधिकार आंदोलनों से उनका गहरा सरोकार रखते थे।

वरिष्ठ पत्रकार अरुण कुमार के निधन पर बिहार श्रमजीवी पत्रकार यूनियन ने शोक जताया है। यूनियन के प्रदेश अध्यक्ष कमलेश कुमार सिंह ने बताया कि उनके असामयिक निधन से पत्रकारिता जगत को अपूरणीय क्षति हुई है।

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